Friday, 27 March 2026

कहानी/ पंडित जी, तुसी मालिक हो



गौतम चौधरी 

जीवन को यदि किसी एक वाक्य में बाँधना हो, तो शायद इतना कहना पर्याप्त होगा कि वह घटनाओं का एक अनवरत प्रवाह है। कुछ घटनाएँ स्मृति में धुंधली पड़ जाती हैं, कुछ समय के साथ अपना अर्थ बदल लेती हैं, और कुछ-चुपचाप भीतर बैठकर हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं।


मेरे जीवन में भी अनेक घटनाएँ घटी हैं। गाँव से निकलने के बाद तो जैसे जीवन ने स्थायित्व का अर्थ ही बदल दिया। दरभंगा की उस झोपड़ी से लेकर मुज़फ्फरपुर के छात्रावास तक और फिर देश के अलग-अलग शहरों में किराए के कमरों तक-मैंने घर कम और ठिकाने अधिक बदले। इतने मकान मालिक आए और चले गए कि कई के नाम तक स्मृति में नहीं बचे। यह भूल मेरी ही है। मेरे जैसों को अपने मकान मालिकों का नाम याद रखना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। खैर, आज मैं मकान मालिकों की लिस्ट बनाने नहीं बैठा हूं। कुछ स्मृतियां धुंमिल है लेकिन कुछ तो साफ-साफ दिख याद है। कुछ स्मृतियां नेपथ्य में है तो कुछ आज भी प्रत्यक्ष है। चलो कोई बात नहीं। परोक्ष पर चर्चा करने से बेहतर है प्रत्यक्ष पर ही बात की जाए। 


 कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो जीवन में आते नहीं-बस ठहर जाते हैं।

जालंधर के नरेंद्र नाथ मल्होत्रा जी ऐसे ही व्यक्ति थे।


यह उन दिनों की बात है जब मैं चंडीगढ़ में था। अखबार की नौकरी छोड़ दी थी। ऐसा लग रहा था मानों जीवन जैसे एक अनिश्चित विराम पर आकर खड़ी हो गयी हैं। जून की एक दोपहर, सेक्टर-22 के साम्यवादी पुस्तक केंद्र में बैठा बहस का आनंद ले रहा था कि जालंधर से एक परिचित अखबार मालिक का फोन आया। पुराने अंदाज में, ‘‘चौधरी साहब बोल रहे हो, मैं रविन्द्र खन्ना बोल रहा हूं।’’ रविन्द्र साहब मेरे पुराने मित्र थे, अपने आप को हिन्दुवादी चिंतक की श्रेणि में रखते थे लेकिन मेरी दृष्टि में हिन्दुवादी से ज्यादा व्यापारिक मनोवृति के प्राणि थे। खन्ना साहब ने अपने अखबार का डिजिटल वर्जन लॉंच किया था। उन्हें डेक्स पर काम करने वाले कुछ कामगार की जरूरत थी। खन्ना साहब का प्रस्ताव-उनके अखबार के डिजिटल वर्जन में काम करने का था। उसी दिन शाम में साम्यवादी पुस्तक केन्द्र के प्रबंधक, सरदार समरजीत सिंह पाल से विषय पर चर्चा की। समरजीत साहब, सुलझे हुए व्यक्ति हैं। कई विषयों पर समरजीत साहब की दृष्टि बेहद साफ है। वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कथित दक्षिणपंथी सोच वालों की तुलना में मुझे साम्यवादी दृष्टिकोण ज्यादा व्यावहारिक लगता है। राष्ट्रवाद के मामले में भी साम्यवादियों की सोच व्यावहारिक है, जबकि आरएसएस वालों की सोच काल्पनिक और सतही जैसा प्रतीत होता है। खैर, मैंने तो बस समरजीत साहब से अपने बारे में बात करनी थी। उन्होंने खन्ना साहब वाले प्रस्ताव पर मोहर लगा दी। बस, अब मैं भी तय कर लिया, जालंधर चला जाउंगा। 


जालंधर वाला निर्णय आसान नहीं था, पर ठहराव उससे भी कठिन था। अगले ही दिन मैं जालंधर की ओर चल पड़ा।


जालंधर पहुँचकर नौकरी तो तय हो गई, पर प्रश्न था-रहने का। इसी बीच किसी ने कहा-“मल्होत्रा जी का मकान खाली है।”


पहली बार जब मल्होत्रा जी को देखा, तो वे सामान्य से ही लगे-थोड़े कठोर, थोड़े औपचारिक। पर बातचीत शुरू हुई, तो जैसे एक अलग ही व्यक्ति सामने आया। उन्होंने सहज भाव से कहा-

“मकान अभी ठीक हो रहा है, तब तक मंदिर में एक कमरा दिलवा देते हैं।”


यहीं से एक रिश्ता शुरू हुआ-जिसका नाम उस समय मेरे पास नहीं था। दरअसल, आज भी उस रिश्ते का नाम मेरे पास नहीं है लेकिन रिश्ता बन गया। 


मल्होत्रा जी टेलीफोन विभाग के  सेवानिवृत्त अधिकारी थे। दो कोठियाँ थीं-एक में स्वयं रहते थे, दूसरी किराए पर लगाया करते थे। परिवार भरा-पूरा था, पर उनके भीतर एक अलग तरह का एकांत भी था, जिसे वे कभी शब्द नहीं देते थे।


मंदिर के उस छोटे से कमरे में रहते हुए मैंने जाना कि वे केवल व्यवस्था नहीं करते-ध्यान रखते हैं। मेरे खाने की चिंता, रहने की सुविधा, यहाँ तक कि मेरी दिनचर्या-सब पर उनकी एक शांत, अनकही दृष्टि बनी रहती।


कुछ ही समय बाद जब मैं उनके मकान में शिफ्ट हुआ, तो यह रिश्ता औपचारिकता की सीमाएँ पार कर चुका था।

वे मुझे किरायेदार नहीं मानते थे।

अक्सर हँसते हुए कहते-

“पंडित जी, तुसी मालिक हो।”


उनका व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा था-जैसे हर सच्चा मनुष्य होता है। मंदिर ट्रस्ट से उन्हें कई शिकायतें थीं, परिवार से भी कुछ असंतोष था, पर उन्होंने कभी इन शिकायतों को कटुता में बदलने नहीं दिया। वे बातें करते थे-पर शिकायत नहीं करते थे।


उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी-सहभागिता।

वे केवल सलाह नहीं देते थे, साथ खड़े होते थे।


किराने की दुकान से लेकर सस्ते राशन तक, बेटी के स्कूल से लेकर मेरे रोज़मर्रा के छोटे-बड़े निर्णयों तक-वे हर जगह उपस्थित थे, बिना किसी आग्रह के।


फिर समय ने करवट ली। खन्ना साहब के अखबार वाली नौकरी चली गई। या ऐसा कहें कि मैंने छोड़ दी। जैसे मैंने कई नौकरियां छोड़ी थी, उसी तरह खन्ना साहब के अखबार को भी नमस्ते कर दिया।


ऐसे समय में अक्सर लोग दूर हो जाते हैं, पर मल्होत्रा जी जैसे और पास आ गए। उन्होंने मेरे लिए काम ढूँढा, नए रास्ते सुझाए, यहाँ तक कि एक दिन कहा-


“मंदिर में जगह मिल जाएगी, तुम ढाबा खोल लो। पूँजी की चिंता मत करो।”


उनकी आवाज़ में एक विश्वास था-जो शायद मुझे खुद पर भी नहीं था।


पर जीवन अपने हिसाब से चलती है।


एक दिन राँची से एक पुराने मित्र माधवेन्द्र का फोन आया। माधवेन्द्र कहने लगे, ‘‘अगर अखबार में फिर से नौकरी करनी है तो राँची चले आइए। प्रस्ताव बढ़िया है। नौकरी आसानी से मिल जाएगी।’’ मैं पहले से भी राँची जाने का सोच रहा था। वैसे कई वर्षों तक राँची में रह कर मैंने एक्टिविजम किया है। राँची के चप्पे-चप्पे से वाकफ हूं। माधवेन्द्र का प्रस्ताव बढ़िया लगा। माधवेन्द्र का प्रस्ताव आया और मैं राँची चला गया। जाते समय ढाबे की योजना अधूरी रह गई। मल्होत्रा जी ने कुछ नहीं कहा-बस वैसे ही मुस्कुराए।


राँची में जीवन फिर अपनी उलझनों में घिर गयी। बीच-बीच में उनका फोन आता। कभी किराए की बात नहीं-सिर्फ हालचाल।


फिर कोरोना का समय आया।


एक दिन उनका फोन आया। आवाज़ में थकान थी, पर स्नेह वैसा ही-


“पंडित जी, पैसे की चिंता मत करो, ज़रूरत हो तो बताना।”


मैंने कुछ कहना चाहा, पर शब्द जैसे हल्के पड़ गए।


कुछ ही दिनों बाद खबर मिली-

मल्होत्रा जी नहीं रहे।


जालंधर जाकर हिसाब-किताब तो पूरा किया, पर कुछ रिश्ते हिसाब से नहीं चलते। वे स्मृति में बस जाते हैं-अधूरे, पर पूर्ण।


आज भी जब जीवन की आपाधापी में ठहरकर पीछे देखता हूँ, तो उनके शब्द कानों में गूंजते हैं-


“पंडित जी, तुसी मालिक हो।”


सोचता हूँ-

किराए के उस घर में मैं शायद कभी मालिक नहीं था,

पर मल्होत्रा साहब के स्नेह और विश्वास ने मुझे सचमुच मालिक बना दिया था।


और वे-

सिर्फ मकान मालिक नहीं,

मेरे जीवन के उन दुर्लभ लोगों में से थे,

जो बिना किसी संबंध के भी

अपना हो जाते हैं।

2 comments:

  1. मल्होत्रा जी का सादर नमन । कुछ लोग अमिट छाप छोड़ जाते हैं

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  2. हृदयस्पर्शी यादों का सफर..

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