मैं इतिहास बन रहा हूं।
भूगोलों में बदल रहा हूं।
धीरे-धीरे मैं बुद्ध हो रहा हूं।
बोधगया के बोधी-वृक्ष वाली, ‘‘बुद्धम शरणम गच्छामि‘‘,
अब मुझे स्पष्ट सुनाई देने लगी है।
मैं देख रहा हूं,
स्वेत-धवल वस्त्रों में खुद सुजाता को, कांसे-पीतल नहीं,
सोने भी नहीं,
विशुद्ध मगी मिट्टी के पात्र में,
देशी गुड की खीर लेकर मेरे पास दौरी चली आ रही है।
मैं देख रहा हूं नालंदा के चबूतरे पर
सारिपुत्र को ध्यान-मग्न होते हुए।
अपने सबसे प्रिय शिष्य आनंद को देख रहा हूं,
कुछ वारांगणाओं को संघ में दीक्षित करते हुए।
देख रहा हूं,
वैशाली की नगरवधु को अपने ही पैरों में लोटते हुए।
आश्चर्य! मैं इन्ही आंखों से देख रहा हूं
वैदिक सनातनियों को बराबर का टक्कर देते हुए,
समाज में वर्णसंकर कहे जाने वाले,
अपने प्रिये शिष्य चुलपंथक को।
इसीलिए मैं बार-बार कह रहा हूं,
इतिहास बन रहा हूं,
भूगोलों में बदल रहा हूं,
धीरे-धीरे मैं बुद्ध हो रहा हूं।
लियो ताल्सटाॅय की कथाओं में गहराई से प्रवेश कर रहा हूं।
शांति की संवेदना और युद्ध की आक्रामकता को एक बार फिर से समझने लगा हूं।
मैं सुन रहा हूं, नये विश्व की आहट को।
समझने लगा हूं उत्तर आधुनिकता के प्रपंचों को।
इसिलिए तो नये ‘‘न्याय‘‘ दर्शन की खोज करने लगा हूं।
सांख्य के विज्ञानभिक्षु की मिमांशा को पढने लगा हूं।
यही कारण है कि बार-बार कह रहा हूं,
इतिहास बन रहा हूं,
भूगोलों में बदल रहा हूं
धीरे-धीरे मैं बुद्ध हो रहा हूं।
वेदों मंत्रों से अभिशिक्त,
अधजले ज्ञान की समिधा को समेट रहा हूं।
भारतीय प्रायद्वीप पर उपजे मीथकों को सहेज रहा हूं।
कल्पनाओं को परख रहा हूं और कला-संस्कृति को देख रहा हूं।
कृष्णद्वैपायण के कर्मवाद को मान लिया मैंने,
पर कृष्ण के शरण में जाने से कतरा रहा हूं।
एक बार फिर से जोर लगाकर, आनंद को नहीं!
सनिपुत्र, महामुदग्लायन, मंजुश्री, नागसेन की टीम खडी कर रहा हूं।
चीन, जापान, म्यामा, अफ्रिका, उरोप, मायादेश गये सभी भिख्खुओं को वापस बुला रहा हूं।
कौआकोल के बियावान में अंतिम बौद्ध सम्मेलन की तैयारी में लगा हूं।
नंग-धरंग हो रही संस्कृति को,
धर्म की आकृति को,
व्यक्ति के प्रवृति को,
मचोर कर फिर से भारतीय ढांचे में लाने का प्रयास कर रहा हूं।
कान लगाकर सुनो!
इस बार कोई मंत्र नहीं,
नारा दे रहा हूं -
बुद्धत्व को प्राप्त करो, ‘‘बुद्धम शरणम गच्छामि।‘‘
संगठन का निर्माण करो, ‘‘संघम शरणम गच्छामि।‘‘
फिर, धर्म का प्रचार करो, ‘‘धम्म शरणम गच्छामि।‘‘
इसलिए मो मैंने कहा
इतिहास बन रहा हूं।
भूगोल में बदल रहा हूं।
धाीरे-धीरे मैं बुद्ध हो रहा हूं।
धीरे-धीरे मैं बुद्ध हो रहा हूं।
-गौतम हुडदंगी।
