Friday, 27 March 2026

कहानी/ पंडित जी, तुसी मालिक हो



गौतम चौधरी 

जीवन को यदि किसी एक वाक्य में बाँधना हो, तो शायद इतना कहना पर्याप्त होगा कि वह घटनाओं का एक अनवरत प्रवाह है। कुछ घटनाएँ स्मृति में धुंधली पड़ जाती हैं, कुछ समय के साथ अपना अर्थ बदल लेती हैं, और कुछ-चुपचाप भीतर बैठकर हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं।


मेरे जीवन में भी अनेक घटनाएँ घटी हैं। गाँव से निकलने के बाद तो जैसे जीवन ने स्थायित्व का अर्थ ही बदल दिया। दरभंगा की उस झोपड़ी से लेकर मुज़फ्फरपुर के छात्रावास तक और फिर देश के अलग-अलग शहरों में किराए के कमरों तक-मैंने घर कम और ठिकाने अधिक बदले। इतने मकान मालिक आए और चले गए कि कई के नाम तक स्मृति में नहीं बचे। यह भूल मेरी ही है। मेरे जैसों को अपने मकान मालिकों का नाम याद रखना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। खैर, आज मैं मकान मालिकों की लिस्ट बनाने नहीं बैठा हूं। कुछ स्मृतियां धुंमिल है लेकिन कुछ तो साफ-साफ दिख याद है। कुछ स्मृतियां नेपथ्य में है तो कुछ आज भी प्रत्यक्ष है। चलो कोई बात नहीं। परोक्ष पर चर्चा करने से बेहतर है प्रत्यक्ष पर ही बात की जाए। 


 कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो जीवन में आते नहीं-बस ठहर जाते हैं।

जालंधर के नरेंद्र नाथ मल्होत्रा जी ऐसे ही व्यक्ति थे।


यह उन दिनों की बात है जब मैं चंडीगढ़ में था। अखबार की नौकरी छोड़ दी थी। ऐसा लग रहा था मानों जीवन जैसे एक अनिश्चित विराम पर आकर खड़ी हो गयी हैं। जून की एक दोपहर, सेक्टर-22 के साम्यवादी पुस्तक केंद्र में बैठा बहस का आनंद ले रहा था कि जालंधर से एक परिचित अखबार मालिक का फोन आया। पुराने अंदाज में, ‘‘चौधरी साहब बोल रहे हो, मैं रविन्द्र खन्ना बोल रहा हूं।’’ रविन्द्र साहब मेरे पुराने मित्र थे, अपने आप को हिन्दुवादी चिंतक की श्रेणि में रखते थे लेकिन मेरी दृष्टि में हिन्दुवादी से ज्यादा व्यापारिक मनोवृति के प्राणि थे। खन्ना साहब ने अपने अखबार का डिजिटल वर्जन लॉंच किया था। उन्हें डेक्स पर काम करने वाले कुछ कामगार की जरूरत थी। खन्ना साहब का प्रस्ताव-उनके अखबार के डिजिटल वर्जन में काम करने का था। उसी दिन शाम में साम्यवादी पुस्तक केन्द्र के प्रबंधक, सरदार समरजीत सिंह पाल से विषय पर चर्चा की। समरजीत साहब, सुलझे हुए व्यक्ति हैं। कई विषयों पर समरजीत साहब की दृष्टि बेहद साफ है। वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कथित दक्षिणपंथी सोच वालों की तुलना में मुझे साम्यवादी दृष्टिकोण ज्यादा व्यावहारिक लगता है। राष्ट्रवाद के मामले में भी साम्यवादियों की सोच व्यावहारिक है, जबकि आरएसएस वालों की सोच काल्पनिक और सतही जैसा प्रतीत होता है। खैर, मैंने तो बस समरजीत साहब से अपने बारे में बात करनी थी। उन्होंने खन्ना साहब वाले प्रस्ताव पर मोहर लगा दी। बस, अब मैं भी तय कर लिया, जालंधर चला जाउंगा। 


जालंधर वाला निर्णय आसान नहीं था, पर ठहराव उससे भी कठिन था। अगले ही दिन मैं जालंधर की ओर चल पड़ा।


जालंधर पहुँचकर नौकरी तो तय हो गई, पर प्रश्न था-रहने का। इसी बीच किसी ने कहा-“मल्होत्रा जी का मकान खाली है।”


पहली बार जब मल्होत्रा जी को देखा, तो वे सामान्य से ही लगे-थोड़े कठोर, थोड़े औपचारिक। पर बातचीत शुरू हुई, तो जैसे एक अलग ही व्यक्ति सामने आया। उन्होंने सहज भाव से कहा-

“मकान अभी ठीक हो रहा है, तब तक मंदिर में एक कमरा दिलवा देते हैं।”


यहीं से एक रिश्ता शुरू हुआ-जिसका नाम उस समय मेरे पास नहीं था। दरअसल, आज भी उस रिश्ते का नाम मेरे पास नहीं है लेकिन रिश्ता बन गया। 


मल्होत्रा जी टेलीफोन विभाग के  सेवानिवृत्त अधिकारी थे। दो कोठियाँ थीं-एक में स्वयं रहते थे, दूसरी किराए पर लगाया करते थे। परिवार भरा-पूरा था, पर उनके भीतर एक अलग तरह का एकांत भी था, जिसे वे कभी शब्द नहीं देते थे।


मंदिर के उस छोटे से कमरे में रहते हुए मैंने जाना कि वे केवल व्यवस्था नहीं करते-ध्यान रखते हैं। मेरे खाने की चिंता, रहने की सुविधा, यहाँ तक कि मेरी दिनचर्या-सब पर उनकी एक शांत, अनकही दृष्टि बनी रहती।


कुछ ही समय बाद जब मैं उनके मकान में शिफ्ट हुआ, तो यह रिश्ता औपचारिकता की सीमाएँ पार कर चुका था।

वे मुझे किरायेदार नहीं मानते थे।

अक्सर हँसते हुए कहते-

“पंडित जी, तुसी मालिक हो।”


उनका व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा था-जैसे हर सच्चा मनुष्य होता है। मंदिर ट्रस्ट से उन्हें कई शिकायतें थीं, परिवार से भी कुछ असंतोष था, पर उन्होंने कभी इन शिकायतों को कटुता में बदलने नहीं दिया। वे बातें करते थे-पर शिकायत नहीं करते थे।


उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी-सहभागिता।

वे केवल सलाह नहीं देते थे, साथ खड़े होते थे।


किराने की दुकान से लेकर सस्ते राशन तक, बेटी के स्कूल से लेकर मेरे रोज़मर्रा के छोटे-बड़े निर्णयों तक-वे हर जगह उपस्थित थे, बिना किसी आग्रह के।


फिर समय ने करवट ली। खन्ना साहब के अखबार वाली नौकरी चली गई। या ऐसा कहें कि मैंने छोड़ दी। जैसे मैंने कई नौकरियां छोड़ी थी, उसी तरह खन्ना साहब के अखबार को भी नमस्ते कर दिया।


ऐसे समय में अक्सर लोग दूर हो जाते हैं, पर मल्होत्रा जी जैसे और पास आ गए। उन्होंने मेरे लिए काम ढूँढा, नए रास्ते सुझाए, यहाँ तक कि एक दिन कहा-


“मंदिर में जगह मिल जाएगी, तुम ढाबा खोल लो। पूँजी की चिंता मत करो।”


उनकी आवाज़ में एक विश्वास था-जो शायद मुझे खुद पर भी नहीं था।


पर जीवन अपने हिसाब से चलती है।


एक दिन राँची से एक पुराने मित्र माधवेन्द्र का फोन आया। माधवेन्द्र कहने लगे, ‘‘अगर अखबार में फिर से नौकरी करनी है तो राँची चले आइए। प्रस्ताव बढ़िया है। नौकरी आसानी से मिल जाएगी।’’ मैं पहले से भी राँची जाने का सोच रहा था। वैसे कई वर्षों तक राँची में रह कर मैंने एक्टिविजम किया है। राँची के चप्पे-चप्पे से वाकफ हूं। माधवेन्द्र का प्रस्ताव बढ़िया लगा। माधवेन्द्र का प्रस्ताव आया और मैं राँची चला गया। जाते समय ढाबे की योजना अधूरी रह गई। मल्होत्रा जी ने कुछ नहीं कहा-बस वैसे ही मुस्कुराए।


राँची में जीवन फिर अपनी उलझनों में घिर गयी। बीच-बीच में उनका फोन आता। कभी किराए की बात नहीं-सिर्फ हालचाल।


फिर कोरोना का समय आया।


एक दिन उनका फोन आया। आवाज़ में थकान थी, पर स्नेह वैसा ही-


“पंडित जी, पैसे की चिंता मत करो, ज़रूरत हो तो बताना।”


मैंने कुछ कहना चाहा, पर शब्द जैसे हल्के पड़ गए।


कुछ ही दिनों बाद खबर मिली-

मल्होत्रा जी नहीं रहे।


जालंधर जाकर हिसाब-किताब तो पूरा किया, पर कुछ रिश्ते हिसाब से नहीं चलते। वे स्मृति में बस जाते हैं-अधूरे, पर पूर्ण।


आज भी जब जीवन की आपाधापी में ठहरकर पीछे देखता हूँ, तो उनके शब्द कानों में गूंजते हैं-


“पंडित जी, तुसी मालिक हो।”


सोचता हूँ-

किराए के उस घर में मैं शायद कभी मालिक नहीं था,

पर मल्होत्रा साहब के स्नेह और विश्वास ने मुझे सचमुच मालिक बना दिया था।


और वे-

सिर्फ मकान मालिक नहीं,

मेरे जीवन के उन दुर्लभ लोगों में से थे,

जो बिना किसी संबंध के भी

अपना हो जाते हैं।

Saturday, 12 November 2016

इसीलिए मैं टेलीविजन नहीं देखता


दिनभर उटपटांग खबरें
फलतू का बयान
फंतासी आंकड़े
प्रतिभूति या वायदा बाजार
यही अनाप-सनाप दिखाता परोसता।
इसीलिए मैं टेलीविजन नहीं देखता।
श्री यंत्र या तंत्र-मंत्र
योग या धर्म का व्यापार
सरकारी विज्ञापन
या बेमतलव का प्रचार
दूरदर्शन मात्र झूठ दिखाता बेचता।
इसीलिए मैं टेलीविजन नहीं देखता।
दिखावटी बहस
फिल्मी गौशिप
फरेब
या फिर अश्लील गानें
न जाने यह एडिट बौक्स क्या क्या परोसता।
इसीलिए मैं टेलीविजन नहीं देखता।

गौतम चौधरी
12/11/2016

Friday, 26 August 2016

देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
की कविता।

यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो ?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो ?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है ।
देश काग़ज़ पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियाँ, पर्वत, शहर, गाँव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें ।
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है ।
इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
काग़ज़ पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और ज़मीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है।
जो विवेक
खड़ा हो लाशों को टेक
वह अन्धा है
जो शासन
चल रहा हो बन्दूक की नली से
हत्यारों का धन्धा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है ।
याद रखो
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन ।
ऐसा ख़ून बहकर
धरती में जज़्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है ।
जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे ख़ून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो –
तुम्हें यहाँ साँस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।
आख़ि‍री बात
बिल्कुल साफ़
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ़
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार ,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार।

Saturday, 2 January 2016

मैं पाटलीपुत्र हूं


गौतम चौधरी
मैं पाटलीपुत्र हूं!
मुङो देखो, नजदीक आकर देखो, और पास आओ।
मैं वही पाटलीपुत्र हूं।
आर्य विष्णुगुप्त चाणक्य का पाटलीपुत्र,
आचार्य गोविन्द रचित पाटलीपुत्र। 
तुङो वर्षाकार और सुनिग्ध की आवाज आज भी सुनाई देगी यहां,
तुङो खंडहरों में विरासत नजर आएगी,
गौर से देखो
गंगा और सोन के दोआब में बसे 
पाटलीपुत्र को देखो
पास आकर देखो
मैं वही पाटलीपुत्र हूं
मैं पाटलीपुत्र हूं।
अब अशोक, बिम्बसार, बिन्दुसार, चद्रगुप्त मौर्य 
इतिहास के पन्नों में उकेर दिये गये हैं 
लेकिन मगध साम्राज्य की प्रतिध्वनि तुङो आज भी सुनाई देगी यहां।
गीत-गोविन्द सुने हो,
अर्थशास्त्र पढ़े हो,
त्रिपिटक और जैनागमनों का अध्ययन किये हो?
ये दुनिया को आन्दोलित करने वाली किताबें,
नई सभ्यता की नीव रखने वाली किताब,
पाटलीपुत्र की ही तो उपज है।
पटना के काली घाट से देखो,
अजीमाबाद के किसी भवन पर चढ़कर देखो,
खुदाबख्श पुस्तकालय में बैठकर देखो,
महान सिपाही संत गुरु गोबिन्द सिंह की नजरों से देखो।
मैं वही पाटलीपुत्र दिखूंगा
क्योंकि मैं पाटलीपुत्र हूं
हां, मैं पाटलीपुत्र हूं।
कई बार लूटा गया मैं,
कई बार परास्त हुआ,
मेरे पूरे शरीर में अनगिनत अस्त्र-शस्त्र 
के घाव तुङो साफ दिखेंगे
मैं अपनों, अपने बेटी-बेटियों 
के अंतरकलह से भी पराजित होता रहा हूं।
पानी और आग ने भी मुङो परेशान किया है।
भूल गये!
जब महात्मा बुद्ध ने पाटलीपुत्र 
की भविष्यवाणी की थी। 
कई योद्धा आए,
हमसे टकराए,
कुछ हमसे हार गये,
पर कुछ जीते।
याद रख, मैं कोई भौतिक शहर नहीं था,
मैं कोई राजा-रानियों की कहानी मात्र नहीं था,
मैं एक चिंतन हूं।
तभी तो मैं वृहद्रथ की हत्या के बाद भी जीवित रहा,
डटकर खड़ा रहा।
बुद्ध, जैन, वैष्णव के प्रयाग प्रशस्ति में।
आज भी जिंदा हूं। मैं कायांतरित चट्टान की तरह हूं।
मुङो ज्वालामुखी के गर्म लावाओं को स्वेत मरमर
बदलने आता है।
गिरीब्रज के चतुर्दिक पहाड़ को देखे हो,
जरासंध के अखाड़े को देखे हो?
भारत के इतिहास को जानना है तो
मेरे अवशेष को मत देखो,
मेरे खंडहरों पर मत जाओ,
आओ मेरे पास आओ,
मुङो गौर से देखो,
मुङो पढ़ो,
मेरा मनन और चिंतन करो,
क्योंकि मैं पाटलीपुत्र हूं।
मैं भारत का वृहद इतिहास हूं।
मैं भारत का राजनीतिक भूगोल भी हूं। 
मैं फिर से आकार ले रहा हूं।
अपने विचारों की ताकत को 
फिर से समेट रहा हूं
एक नया इतिहास बनाने के लिए 
फिर से अपने खंडहरों भगAावेशेषों और ज्ञान को
इकट्ठा करने लगा हूं।
भविष्य की चुनौतियों 
को मैं स्पष्ट देख रहा हूं।
जब बामियान में बुद्ध के टुकड़े किये गये,
जब चीन में हमारे चिंतन को नकारा गया,
मुङो बड़ा दुख हुआ था।
मैं रोया
गंगा के किनारे रात के अंधेरे में
मौन स्तब्ध भविष्य के पदचाप को सुनने की कोशिश की।
मानवता पर आने वाले 
संकट को स्पष्ट देखने लगा।
तब मुङो महान पितृभक्त कुणाल की याद आयी
आज भी उसकी दोनों आंखें मुङो याद है।
मैं चित्रलेखा के नृत्य में मगA हो गया था
गांधी मैदान में पटाखे की आवाज ने मुङो झकझोर दिया
मेरी आंखों के आगे महेन्द्र और संघमित्र खड़े थे
दोनों अट्टहास कर रहे थे
दोनों हमारी समृद्धि और वैभव का उपहास उड़ा रहे थे
वैशाली और त्रिभुक्ति विजय पर मुङो कोस करे थे
मध्यदेश के आन्दोलन पर मुङो चिढा रहे थे
तब मुङो मंडन मिश्र की याद आई।
शंकराचार्य-भारती के मिथकीय संवाद 
पर मैं मौन हो गया
क्योंकि बुद्ध के शिष्यों का खड़ा किया गया
बज्र और तंत्रयान भी तो मेरे अंकों में पला था।
मेरे ही पुत्रों ने कालयमन को आतंत्रित किया था।
तब मुङो विद्यापति के पद याद आने लगे
द्वारबंग, भगदतपुर, चंपा नगरी, मिथला, गिरिब्रज, वैशाली
जो मेरी ही प्रतिकृति था
उसे मैं कैसे भूल सकता हूं
उसके वैभव को, उसके चरित्र को,
उसके स्वाभिमान को, मेरे ही कुछ लोगों ने रौंद डाला था।
एक ओर अशोक उत्कल विजय का जश्न मना रहे थे
दूसरी ओर मैं कलिंग के साथ बैठकर आंसू बहा रहा था।
अब पुरानी बातें,
वह स्वर्ण-युग,
कालजयी योद्धा,
अदम्य साहसी चिंतक मेरे पास नहीं रहे।
पर मैं फिर से खड़ा हो रहा हूं।
मेरे पांव कीचड़ में जरूर हैं
लेकिन हौसला मजबूत है।
आओ मेरे पास आओ
मुङो गौर से देखो
मैं वही पाटलीपुत्र दिखुंगा
क्योंकि मैं पाटलीपुत्र हूं,
मैं ही पाटलीपुत्र हूं।

Monday, 1 June 2015

बुद्ध मौन है!



गौतम हुडदंगी

कुछ ने कहा बुर्जुवा है,
कुछ ने कहा साम्यवादी,
कुछ मौन थे और कुछ दक्षिणपंथी मूल्यों के साये में अपने आप को ढकने की कोशिश कर रहे थे।
आकाश का रंग बदलने लगा।
इतिहास के हर पन्नों पर मध्यकालीन बरबरता के चिंह दिखने लगे।
काल के गाल में समाधिस्थ बुद्ध!
कालांतर की कहानियां को बदल दी गयी।
नदियों को जोडने के नाम पर पानी पर नियंत्रण कर लिया गया।
हवा की शुद्धता के नाम पर प्रत्येक जीव-जंतुओं के सासों पर पहरे बिठा दिये गये।
आयोडीन के नाम पर नमक का व्यापार प्रारंभ किया गया।
पूरा जंगल साफ कर दिया गया,
उसके स्थान पर कंकरीट के मकान,
तारकोल की सडकें और माॅल,
मल्टिपैक्स सिनेमाहाॅल बनाए गये।
इतिहास कुछ नहीं,
भूगोल कुछ नहीं,
धर्म, संस्कृति, मूल्य, सिद्धांत, सब को डस्टबिन में डाल दिया गया।
फेंक दी गयी वो तमाम किताबें,
जिसमें आत्मचिंतन और नियंत्रण की बात लिखी गयी थी।
जला दिये गये उन तमाम मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा और गिर्जाघरों को
जहां मानवता बताई जाती थी।
उसके स्थान पर योग का व्यापार खडा किया जा रहा है।
धर्म की राजनीति प्रारंभ की गयी।
संप्रदाय का तिलिस्म खडा किया जा रहा है।
इकीसवीं शदी के लिए हर को तैयार किया जा रहा है।
काॅमोडीटी मार्केट में अन्न बेचे जा रहे हैं और रोटी के बदले इंश्योरैंस पडोशा जा रहा है।
दुनिया के पूंजीपरस्थों की राजधानी, उत्तर आधुनिकता के केन्द्र अमेरिका में स्थापित कर दी गयी।
साम्यवाद के बदतमीज कीडे और बजबजाते पिल्लुओं को चीन में छोड दिया गया है।
हर धारावाहिकों नाटकों में नग्नता और समाज-परिवार को तोडने के इल्म सिखाए जा रहे हैं।
दुनिया को विकास का नया रास्ता बताया जा रहा है।
नंगे और दुनिया को अपनी रखैल बनाने वाले दुनिया को नई सभ्यता की सीख दे रहे हैं।
कुछ व्यापारी समूह शान्ति के नगमें गाने लगे हैं।
जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था अशांति के व्यापार पर टिकी है,
वह बुद्ध और गांधी के आचार संहिताओं पर संविमर्श कराने लगे हैं।
दुनिया, कहां जा रही है?
बुद्ध मौन है!

Tuesday, 2 September 2014

मैं बुद्ध हो रहा हूं





मैं इतिहास बन रहा हूं।
भूगोलों में बदल रहा हूं।
धीरे-धीरे मैं बुद्ध हो रहा हूं।
बोधगया के बोधी-वृक्ष वाली, ‘‘बुद्धम शरणम गच्छामि‘‘,
अब मुझे स्पष्ट सुनाई देने लगी है।
मैं देख रहा हूं,
स्वेत-धवल वस्त्रों में खुद सुजाता को, कांसे-पीतल नहीं,
सोने भी नहीं,
विशुद्ध मगी मिट्टी के पात्र में,
देशी गुड की खीर लेकर मेरे पास दौरी चली आ रही है।
मैं देख रहा हूं नालंदा के चबूतरे पर
सारिपुत्र को ध्यान-मग्न होते हुए।
अपने सबसे प्रिय शिष्य आनंद को देख रहा हूं,
कुछ वारांगणाओं को संघ में दीक्षित करते हुए।
देख रहा हूं,
वैशाली की नगरवधु को अपने ही पैरों में लोटते हुए।
आश्चर्य! मैं इन्ही आंखों से देख रहा हूं
वैदिक सनातनियों को बराबर का टक्कर देते हुए,
समाज में वर्णसंकर कहे जाने वाले,
अपने प्रिये शिष्य चुलपंथक को।

इसीलिए मैं बार-बार कह रहा हूं,
इतिहास बन रहा हूं,
भूगोलों में बदल रहा हूं,
धीरे-धीरे मैं बुद्ध हो रहा हूं।
लियो ताल्सटाॅय की कथाओं में गहराई से प्रवेश कर रहा हूं।
शांति की संवेदना और युद्ध की आक्रामकता को एक बार फिर से समझने लगा हूं।
मैं सुन रहा हूं, नये विश्व की आहट को।
समझने लगा हूं उत्तर आधुनिकता के प्रपंचों को।
इसिलिए तो नये ‘‘न्याय‘‘ दर्शन की खोज करने लगा हूं।
सांख्य के विज्ञानभिक्षु की मिमांशा को पढने लगा हूं।

यही कारण है कि बार-बार कह रहा हूं,
इतिहास बन रहा हूं,
भूगोलों में बदल रहा हूं
धीरे-धीरे मैं बुद्ध हो रहा हूं।
वेदों मंत्रों से अभिशिक्त,
अधजले ज्ञान की समिधा को समेट रहा हूं।
भारतीय प्रायद्वीप पर उपजे मीथकों को सहेज रहा हूं।
कल्पनाओं को परख रहा हूं और कला-संस्कृति को देख रहा हूं।
कृष्णद्वैपायण के कर्मवाद को मान लिया मैंने,
पर कृष्ण के शरण में जाने से कतरा रहा हूं।
एक बार फिर से जोर लगाकर, आनंद को नहीं!
सनिपुत्र, महामुदग्लायन, मंजुश्री, नागसेन की टीम खडी कर रहा हूं।
चीन, जापान, म्यामा, अफ्रिका, उरोप, मायादेश गये सभी भिख्खुओं को वापस बुला रहा हूं।
कौआकोल के बियावान में अंतिम बौद्ध सम्मेलन की तैयारी में लगा हूं।
नंग-धरंग हो रही संस्कृति को,
धर्म की आकृति को,
व्यक्ति के प्रवृति को,
मचोर कर फिर से भारतीय ढांचे में लाने का प्रयास कर रहा हूं।
कान लगाकर सुनो!
इस बार कोई मंत्र नहीं,
नारा दे रहा हूं -
बुद्धत्व को प्राप्त करो, ‘‘बुद्धम शरणम गच्छामि।‘‘
संगठन का निर्माण करो, ‘‘संघम शरणम गच्छामि।‘‘
फिर, धर्म का प्रचार करो, ‘‘धम्म शरणम गच्छामि।‘‘
इसलिए मो मैंने कहा
इतिहास बन रहा हूं।
भूगोल में बदल रहा हूं।
धाीरे-धीरे मैं बुद्ध हो रहा हूं।
धीरे-धीरे मैं बुद्ध हो रहा हूं।

                -गौतम हुडदंगी।