गौतम हुडदंगी
कुछ ने कहा बुर्जुवा है,
कुछ ने कहा साम्यवादी,
कुछ मौन थे और कुछ दक्षिणपंथी मूल्यों के साये में अपने आप को ढकने की कोशिश कर रहे थे।
आकाश का रंग बदलने लगा।
इतिहास के हर पन्नों पर मध्यकालीन बरबरता के चिंह दिखने लगे।
काल के गाल में समाधिस्थ बुद्ध!
कालांतर की कहानियां को बदल दी गयी।
नदियों को जोडने के नाम पर पानी पर नियंत्रण कर लिया गया।
हवा की शुद्धता के नाम पर प्रत्येक जीव-जंतुओं के सासों पर पहरे बिठा दिये गये।
आयोडीन के नाम पर नमक का व्यापार प्रारंभ किया गया।
पूरा जंगल साफ कर दिया गया,
उसके स्थान पर कंकरीट के मकान,
तारकोल की सडकें और माॅल,
मल्टिपैक्स सिनेमाहाॅल बनाए गये।
इतिहास कुछ नहीं,
भूगोल कुछ नहीं,
धर्म, संस्कृति, मूल्य, सिद्धांत, सब को डस्टबिन में डाल दिया गया।
फेंक दी गयी वो तमाम किताबें,
जिसमें आत्मचिंतन और नियंत्रण की बात लिखी गयी थी।
जला दिये गये उन तमाम मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा और गिर्जाघरों को
जहां मानवता बताई जाती थी।
उसके स्थान पर योग का व्यापार खडा किया जा रहा है।
धर्म की राजनीति प्रारंभ की गयी।
संप्रदाय का तिलिस्म खडा किया जा रहा है।
इकीसवीं शदी के लिए हर को तैयार किया जा रहा है।
काॅमोडीटी मार्केट में अन्न बेचे जा रहे हैं और रोटी के बदले इंश्योरैंस पडोशा जा रहा है।
दुनिया के पूंजीपरस्थों की राजधानी, उत्तर आधुनिकता के केन्द्र अमेरिका में स्थापित कर दी गयी।
साम्यवाद के बदतमीज कीडे और बजबजाते पिल्लुओं को चीन में छोड दिया गया है।
हर धारावाहिकों नाटकों में नग्नता और समाज-परिवार को तोडने के इल्म सिखाए जा रहे हैं।
दुनिया को विकास का नया रास्ता बताया जा रहा है।
नंगे और दुनिया को अपनी रखैल बनाने वाले दुनिया को नई सभ्यता की सीख दे रहे हैं।
कुछ व्यापारी समूह शान्ति के नगमें गाने लगे हैं।
जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था अशांति के व्यापार पर टिकी है,
वह बुद्ध और गांधी के आचार संहिताओं पर संविमर्श कराने लगे हैं।
दुनिया, कहां जा रही है?
बुद्ध मौन है!