Saturday, 12 November 2016

इसीलिए मैं टेलीविजन नहीं देखता


दिनभर उटपटांग खबरें
फलतू का बयान
फंतासी आंकड़े
प्रतिभूति या वायदा बाजार
यही अनाप-सनाप दिखाता परोसता।
इसीलिए मैं टेलीविजन नहीं देखता।
श्री यंत्र या तंत्र-मंत्र
योग या धर्म का व्यापार
सरकारी विज्ञापन
या बेमतलव का प्रचार
दूरदर्शन मात्र झूठ दिखाता बेचता।
इसीलिए मैं टेलीविजन नहीं देखता।
दिखावटी बहस
फिल्मी गौशिप
फरेब
या फिर अश्लील गानें
न जाने यह एडिट बौक्स क्या क्या परोसता।
इसीलिए मैं टेलीविजन नहीं देखता।

गौतम चौधरी
12/11/2016

Friday, 26 August 2016

देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
की कविता।

यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो ?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो ?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है ।
देश काग़ज़ पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियाँ, पर्वत, शहर, गाँव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें ।
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है ।
इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
काग़ज़ पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और ज़मीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है।
जो विवेक
खड़ा हो लाशों को टेक
वह अन्धा है
जो शासन
चल रहा हो बन्दूक की नली से
हत्यारों का धन्धा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है ।
याद रखो
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन ।
ऐसा ख़ून बहकर
धरती में जज़्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है ।
जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे ख़ून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो –
तुम्हें यहाँ साँस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।
आख़ि‍री बात
बिल्कुल साफ़
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ़
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार ,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार।

Saturday, 2 January 2016

मैं पाटलीपुत्र हूं


गौतम चौधरी
मैं पाटलीपुत्र हूं!
मुङो देखो, नजदीक आकर देखो, और पास आओ।
मैं वही पाटलीपुत्र हूं।
आर्य विष्णुगुप्त चाणक्य का पाटलीपुत्र,
आचार्य गोविन्द रचित पाटलीपुत्र। 
तुङो वर्षाकार और सुनिग्ध की आवाज आज भी सुनाई देगी यहां,
तुङो खंडहरों में विरासत नजर आएगी,
गौर से देखो
गंगा और सोन के दोआब में बसे 
पाटलीपुत्र को देखो
पास आकर देखो
मैं वही पाटलीपुत्र हूं
मैं पाटलीपुत्र हूं।
अब अशोक, बिम्बसार, बिन्दुसार, चद्रगुप्त मौर्य 
इतिहास के पन्नों में उकेर दिये गये हैं 
लेकिन मगध साम्राज्य की प्रतिध्वनि तुङो आज भी सुनाई देगी यहां।
गीत-गोविन्द सुने हो,
अर्थशास्त्र पढ़े हो,
त्रिपिटक और जैनागमनों का अध्ययन किये हो?
ये दुनिया को आन्दोलित करने वाली किताबें,
नई सभ्यता की नीव रखने वाली किताब,
पाटलीपुत्र की ही तो उपज है।
पटना के काली घाट से देखो,
अजीमाबाद के किसी भवन पर चढ़कर देखो,
खुदाबख्श पुस्तकालय में बैठकर देखो,
महान सिपाही संत गुरु गोबिन्द सिंह की नजरों से देखो।
मैं वही पाटलीपुत्र दिखूंगा
क्योंकि मैं पाटलीपुत्र हूं
हां, मैं पाटलीपुत्र हूं।
कई बार लूटा गया मैं,
कई बार परास्त हुआ,
मेरे पूरे शरीर में अनगिनत अस्त्र-शस्त्र 
के घाव तुङो साफ दिखेंगे
मैं अपनों, अपने बेटी-बेटियों 
के अंतरकलह से भी पराजित होता रहा हूं।
पानी और आग ने भी मुङो परेशान किया है।
भूल गये!
जब महात्मा बुद्ध ने पाटलीपुत्र 
की भविष्यवाणी की थी। 
कई योद्धा आए,
हमसे टकराए,
कुछ हमसे हार गये,
पर कुछ जीते।
याद रख, मैं कोई भौतिक शहर नहीं था,
मैं कोई राजा-रानियों की कहानी मात्र नहीं था,
मैं एक चिंतन हूं।
तभी तो मैं वृहद्रथ की हत्या के बाद भी जीवित रहा,
डटकर खड़ा रहा।
बुद्ध, जैन, वैष्णव के प्रयाग प्रशस्ति में।
आज भी जिंदा हूं। मैं कायांतरित चट्टान की तरह हूं।
मुङो ज्वालामुखी के गर्म लावाओं को स्वेत मरमर
बदलने आता है।
गिरीब्रज के चतुर्दिक पहाड़ को देखे हो,
जरासंध के अखाड़े को देखे हो?
भारत के इतिहास को जानना है तो
मेरे अवशेष को मत देखो,
मेरे खंडहरों पर मत जाओ,
आओ मेरे पास आओ,
मुङो गौर से देखो,
मुङो पढ़ो,
मेरा मनन और चिंतन करो,
क्योंकि मैं पाटलीपुत्र हूं।
मैं भारत का वृहद इतिहास हूं।
मैं भारत का राजनीतिक भूगोल भी हूं। 
मैं फिर से आकार ले रहा हूं।
अपने विचारों की ताकत को 
फिर से समेट रहा हूं
एक नया इतिहास बनाने के लिए 
फिर से अपने खंडहरों भगAावेशेषों और ज्ञान को
इकट्ठा करने लगा हूं।
भविष्य की चुनौतियों 
को मैं स्पष्ट देख रहा हूं।
जब बामियान में बुद्ध के टुकड़े किये गये,
जब चीन में हमारे चिंतन को नकारा गया,
मुङो बड़ा दुख हुआ था।
मैं रोया
गंगा के किनारे रात के अंधेरे में
मौन स्तब्ध भविष्य के पदचाप को सुनने की कोशिश की।
मानवता पर आने वाले 
संकट को स्पष्ट देखने लगा।
तब मुङो महान पितृभक्त कुणाल की याद आयी
आज भी उसकी दोनों आंखें मुङो याद है।
मैं चित्रलेखा के नृत्य में मगA हो गया था
गांधी मैदान में पटाखे की आवाज ने मुङो झकझोर दिया
मेरी आंखों के आगे महेन्द्र और संघमित्र खड़े थे
दोनों अट्टहास कर रहे थे
दोनों हमारी समृद्धि और वैभव का उपहास उड़ा रहे थे
वैशाली और त्रिभुक्ति विजय पर मुङो कोस करे थे
मध्यदेश के आन्दोलन पर मुङो चिढा रहे थे
तब मुङो मंडन मिश्र की याद आई।
शंकराचार्य-भारती के मिथकीय संवाद 
पर मैं मौन हो गया
क्योंकि बुद्ध के शिष्यों का खड़ा किया गया
बज्र और तंत्रयान भी तो मेरे अंकों में पला था।
मेरे ही पुत्रों ने कालयमन को आतंत्रित किया था।
तब मुङो विद्यापति के पद याद आने लगे
द्वारबंग, भगदतपुर, चंपा नगरी, मिथला, गिरिब्रज, वैशाली
जो मेरी ही प्रतिकृति था
उसे मैं कैसे भूल सकता हूं
उसके वैभव को, उसके चरित्र को,
उसके स्वाभिमान को, मेरे ही कुछ लोगों ने रौंद डाला था।
एक ओर अशोक उत्कल विजय का जश्न मना रहे थे
दूसरी ओर मैं कलिंग के साथ बैठकर आंसू बहा रहा था।
अब पुरानी बातें,
वह स्वर्ण-युग,
कालजयी योद्धा,
अदम्य साहसी चिंतक मेरे पास नहीं रहे।
पर मैं फिर से खड़ा हो रहा हूं।
मेरे पांव कीचड़ में जरूर हैं
लेकिन हौसला मजबूत है।
आओ मेरे पास आओ
मुङो गौर से देखो
मैं वही पाटलीपुत्र दिखुंगा
क्योंकि मैं पाटलीपुत्र हूं,
मैं ही पाटलीपुत्र हूं।